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Showing posts from December, 2022

राष्ट्रीय जीवन मे शिक्षा के विभिन्न कार्य क्या हैं?

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आज शिक्षा का विशेष महत्व है । यों तो शिक्षा का महत्व सदैव ही रहा है , परन्तु आज की बदलती हुई परिस्थिति में शिक्षा के कार्य और बढ़ गये हैं । आज भारत का नैतिक पतन हो रहा है । चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है । भाई - भतीजावाद ( Nepostim ) खूब पनप रहा है । अतः राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा के कार्य और बढ़ गये हैं । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । उसका में व्यतीत होता है । इस दृष्टिकोण से भी शिक्षा का विशेष महत्व है ।  जॉन ड्यूवी ( John Dewy ) का कथन है— “ शिक्षा व्यक्ति की उन सब शक्तियों का विकास है जिनसे वह वातावरण पर अधिकार प्राप्त कर सके तथा भविष्य को आशाओं को पूरा कर सके ।  " इस प्रकार शिक्षा सामाजिक कार्य है । शिक्षा ही व्यक्ति को सामाजिक बना सकती है । इस कारण शिक्षा का विशेष महत्व है । राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा के निम्नलिखित कार्य हैं  1. राष्ट्रीय विकास ( National Development ) - शिक्षा राष्ट्रीय विकास का कार्य करती है । शिक्षा की उत्तम व्यवस्था के द्वारा ही किसी देश का विकास किया जा सकता है । आज भारत में देश के उत्थान के लिए , शिक्षा की नीतियाँ चलाई जा रही हैं । अतः यदि र...

शिक्षा के विभिन्न प्रकारों का परिचय हिन्दी मे

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 शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा का वर्गीकरण अनेक प्रकार से किया है । हम शिक्षा के प्रकारों का वर्गीकरण निम्न प्रकार कर सकते हैं- 1.औपचारिक शिक्षा 2.अनौपचारिक शिक्षा 3.वैकल्पिक एवं नवाचारी शिक्षा 4.दूरस्थ शिक्षा 1.औपचारिक शिक्षा शिक्षा का यह साधन बालक को सप्रयत्न शिक्षा देने का कार्य करता है । इसमें शिक्षा देने की योजना अर्थात् समय , स्थान , अध्यापक , विधि एवं पाठ्यक्रम पूर्व निर्धारित होता है । यह संस्थाएँ अपने द्वारा निर्धारित नियमावली का अनुपालन करती हैं । औपचारिक शिक्षा के लाभों पर प्रकाश डालते हुए ड्यूवी ने कहा है , " औपचारिक शिक्षा के बिना जटिल समाज के साधनों और उपलब्धियों को हस्तान्तरित करना सम्भव नहीं है । यह एक ऐसे अनुभव की प्राप्ति का द्वार खोलती है जिसको बालक दूसरों के साथ रहकर अनौपचारिक शिक्षा के द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता । " 2.नौपचारिक शिक्षा  उत्तर शिक्षा के अनौपचारिक साधन शिक्षा को एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखते हैं । इसका मानना है कि लिखना , पढ़ना या अक्षर ज्ञान प्राप्त कर लेना हो शिक्षा नहीं है । शिक्षा इसमें बहुत अधिक व्यापक तथा विस्तृत प्...

मध्यकालीन ( मुगलकालीन ) शिक्षा की विशेषताएँ

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 यदि हम सम्पूर्ण युग में प्रचलित शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन करें तो हमें उसकी अग्रांकित विशेषताएँ दिखाई पड़ती हैं- 1. उद्देश्य  सम्पूर्ण मुस्लिम युग में अनेक शासक हुए हैं इनमें से कुछ अधिक शिक्षा - प्रेमी थे । कुछ उदार दृष्टिकोण वाले , तो कुछ बहुत ही कट्टर धार्मिक प्रवृत्ति के थे । इन्होंने अपने - अपने दृष्टिकोण से शिक्षा की व्यवस्था की । इस युग के निम्नांकित सामान्य उद्देश्य थे- ( i ) ज्ञान का प्रचार - किसी को सोना देने से शिक्षा देना अधिक उपयोगी है क्योंकि इससे ज्ञान की उन्नति होती है । ' मुहम्मद साहब का ऐसा कहना था ज्ञान अमृत है जो अमरत्व प्रदान करता है । इससे इस्लाम धर्म का प्रचार एवं प्रसार होता है । इसलिए शिक्षा के माध्यम से ज्ञान का प्रसार करना चाहिए । सम्पूर्ण मुस्लिम शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान का प्रसार करना था जिससे इस्लाम का प्रचार व उन्नति हो. ( ii ) धर्म का प्रचार करना - मुसलमान भारत में न केवल सम्पत्ति लूटने तथा शासन करने आये थे वरन् इस्लाम धर्म का प्रचार एवं प्रसार करने भी आये थे । जो जितने अधिक काफिरों को मुसलमान बना सकता था वह खुदा का उतना ही अधिक प्यारा होता ह...

गुप्तकाल की प्रमुख विशेषताएँ और साहित्यिक प्रगति का उल्लेख

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शासकों ने भारत को राजनीतिक एकता, सुरक्षा व भावना प्रदान की। गुप्तकाल शान्ति समृद्धि, नगर संस्कृति तथा परिमार्जन, धार्मिक पुनरुथान तथा बौद्धिक प्रयास, उत्कृष्ट साहित्य तथा कला की उन्नति का युग था। आत्म-विश्वास के साथ भारतीय संस्कृति दरबार के आचार-व्यवहार, मुद्रा, विज्ञान तथा कला के क्षेत्र में विदेशों में बहुत-सी ब अंगीकार कर लीं, परन्तु विदेशों से सीखते समय भी यह ध्यान रखा कि इससे उसकी भारतीय नष्ट न हो। भारत की मूलभूत भारतीयता को पूर्णतः समझा गया, पुष्ट किया गया है तथा उसे परिमार्जित एवं चिरस्थायी रूप में व्यक्त किया गया ताकि आगे आने वाली पीढ़ी के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया जा सके।  डॉ. आर. एस. त्रिपाठी ने भी गुप्त युग को स्वर्ण युग मानते हुए लिखा है, "गुप्त सम्राटों का काल भारतीय इतिहास में स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल के अनेक उदात्त, मेधावी और शक्तिशाली राजाओं ने उत्तर भारत को एक छत्र के नीचे संगठित कर शासन में सुव्यवस्था तथा देश में समृद्धि व शक्ति की स्थापना की।" स्मिथ ने भी भारतीय इतिहास में गुप्त युग की सर्वश्रेष्ठ माना है। उनके शब्दों में, “हिन्दू इतिहास में अन्य स...

वुड के शिक्षा घोषणा पत्र की प्रमुख सिफारिशों का वर्णन

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कम्पनी के आज्ञा पत्र 1833 में बदले थे । अब उन्हें 20 वर्ष बाद पुनः 1853 में परिवर्तित तथा संशोधित करना था । इस बीच वर्ष के समय में कम्पनी डायरेक्टर यह अनुभव कर चुके थे कि भारतीय शिक्षा की अवहेलना करना ठीक नहीं है । अतः ब्रिटिश संसद ने एक - ' संसदीय प्रवर समिति ' ( Select Committee of the House of Commons ) की नियुक्ति की ।  इस कमेटी ने भारतीय शिक्षा का अध्ययन किया तथा अनेक शिक्षाशास्त्रियों के विचार ज्ञात किये । इस समय चार्ल्स वुड ( Charles Wood ) ' बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल ' के अध्यक्ष थे । ' प्रवर समिति ' ने अपना प्रतिवेदन बोर्ड आफ कण्ट्रोल को दिया और बोर्ड आफ कण्ट्रोल ने उसके आधार पर एक पत्र ब्रिटिश संसद को प्रस्तुत किया । यह पत्र ही बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड के नाम पर वुड का शिक्षा घोषणा पत्र कहलाता है । इस घोषणा पत्र के आधार पर कम्पनी ने 19 जुलाई , 1854 को अपनी शिक्षा नीति घोषित की । इस घोषणा पत्र में निम्नलिखित बातें प्रमुख रूप से दी गयी थीं  1. भारतीय क्षेत्र में शिक्षा का प्रसार एवं प्रचार करना कम्पनी का उत्तरदायित्व है । इस प्रकार शिक्षा का दायि...

स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक विचार क्या क्या थे?

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 स्वामी विवेकानन्द भारतीय दर्शन के महान् पण्डित थे । उन्होंने वेदान्त को व्यावहारिक रूप प्रदान किया । उनके विचार उनकी पुस्तकों में पढ़ने को मिलते हैं । उनके क्रियाकलाप रामकृष्ण मिशन के कल्याण कार्यों में देखे जा सकते हैं । शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण व्यापक था ।  1. शिक्षा का अर्थ - स्वामी ने एक बार कहा था , " मैं किसी बात को कभी परिभाषा नहीं करता हूँ । फिर भी शिक्षा की व्याख्या शक्ति के विकास के रूप में की जा सकती है । ' ' विवेकानन्द वेदान्ती थे इसलिए वे मनुष्य को जन्म से पूर्ण मानते थे । इसी पूर्णता की अभिव्यक्ति को वे शिक्षा कहते हैं । स्वामी जी ने अपने शब्दों में शिक्षा का अर्थ इस प्रकार बताया है , " शिक्षा मनुष्य को अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है । "  स्वामीजी का कथन है , शिक्षा उस जानकारी के समुदाय का नाम नहीं है जो तुम्हारे मस्तिष्क में भर दिया गया है और वहाँ पड़े - पड़े तुम्हारी सारी जिन्दगी भर बिना पनाए सड़ रहा है । हमें तो भावों या विचारों को ऐसे आत्मसात कर लेना चाहिए जिससे जीवन निर्माण हो , मनुष्यत्व आवे और चरित्र गठन हो । एक ही वस्तु होती है...

मौर्यकालीन सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति का वर्णन

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मौर्यकालीन सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति के विषय में समसामयिक उपलब्ध स्रोतों से विस्तृत जानकारी उपलब्ध होती है।  कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मैगस्थनीज का भारत वर्णन, मैगस्थनीज के वर्णन का अन्य यूनानी विज्ञानों द्वारा उद्धरण तथा विभिन्न अभिलेख ऐसे स्रोतों में प्रमुख हैं जो तत्कालीन भारतीय सांस्कृतिक स्थिति पर प्रकाश डालते हैं। सामाजिक स्थिति(Social Condition) 1. वर्ण एवं वर्णाश्रम व्यवस्था- वर्ण एवं वर्णाश्रम व्यवस्था मौर्यकाल तक पूर्ण रूप से विकसित हो चुकी थी। कौटिल्य ने धर्मशास्त्रों के समान चार वर्णों का ही वर्णन किया है तथा उनके व्यवसाय निर्धारित किये। पहले के समान ही समाज में ब्राह्मणों की प्रधानता थी। कौटिल्य ने चार वर्णों के अतिरिक्त अनेक वर्णसंकर जातियों का भी उल्लेख अर्थशास्त्र में किया है जिनकी उत्पत्ति विभिन्न वर्णों के अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों के कारण हुई थी। इस वर्णसंकर जातियों में निषाद, मागध, सूत, वेग आदि उल्लेखनीय हैं। कौटिल्य ने सभी वर्णसंकर जातियों को शूद्र ही माना है। मैगस्थनीज ने भारत की वर्ण व्यवस्था के विषय में लिखा है कि कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर वि...