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Showing posts from January, 2023

फसल चक्रण और फसल चक्रण के सिद्धान्त- Fasal Chakrad Aur Fasal Chakrad ke Sidhdant in Hindi

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 फसल चक्रण (Crops Rotation) किसी खेत में एक निश्चित समय में एक फसल के बाद दूसरी फसल लेने की क्रिया को, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट न होने पाये, 'फसल चक्रण' कहते हैं । "The growing of different crops on a piece of land in a preplanned succession is called as crops rotation." अर्थात् भूमि के किसी निश्चित भाग पर नियत समय में फसलों का इस क्रम से बोया जाना कि भूमि की उर्वरा शक्ति भी कम न होने पाये और उपज भी अच्छी मिले इस प्रकार की अदला-बदली फसल चक्रण है । फसल चक्रण के सिद्धान्त (Principles of Crop Rotation) - फसलों से अच्छी पैदावार लेने के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति सुरक्षित बनाये रखने के लिए और अधिकतम आर्थिक लाभ कमाने के लिए निम्नलिखित सिद्धान्त अपनाना चाहिए-  (1) गहरी जड़ों वाली फसल के बाद उथली जड़ों वाली फसल - गहरी जड़ वाली फसलों के बाद उथली जड़ वाली फसलें बोनी चाहिए। इससे दोनों फसलों की पैदावार अच्छी होती है। इसमें दोनों फसलें एक ही सतह से भोजन न लेकर विभिन्न सतहों से अपना भोजन प्राप्त करती है। इसमें दोनों फसलों को उचित मात्रा में भोज्य पदार्थ मिल जाता है तथा भू...

नवजात शिशु की देखभाल के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक टिप्पड़ी

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  नवजात शिशु का रुदन - प्रसव के बाद शिशु तथा माँ दोनों इतने कमजोर तथा असहाय होते हैं कि अपनी देखभाल स्वयं नहीं कर सकते हैं। जिस प्रकार माँ की देखभाल नर्सों तथा दाई को करनी पड़ती है। यदि प्रसव अस्पताल में होता है तो नवजात शिशु की देखभाल भी डॉक्टर और नर्स करते हैं। यदि प्रसव घर पर होता है तो नर्स तथा दाई बच्चे की देखभाल करती है। शिशु जन्म के बाद सबसे पहली चीज यह देखना है कि शिशु जीवित है या मृत शिशु जन्म के बाद डॉक्टर हृदय या नाभिनाल की धड़कन से शिशु के जीवित या मृत होने की पहचान करता है। जन्म के बाद शिशु का रोना आवश्यक है। रोने से बच्चे के फेफड़ों की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है रोने से फेफड़े फैलकर श्वास-क्रिया प्रारम्भ करते हैं। यदि बच्चा स्वयं नहीं रोता तो डॉक्टर उसे रुलाने के विभिन्न उपाय करता है; जैसे - (1) चाँटे मारकर रुलाना।  (2) बच्चे पर पानी के छींटे मारकर रुलाना।  (3) बच्चे के नाक, मुँह में श्लेष्मा जमा होने से भी बच्चा नहीं रो पाता है डॉक्टर रुई से नाक मुँह से श्लेष्मा साफ कर उसे रुलाता है। बच्चे के लिए रोना आवश्यक है, रोने से उसकी श्वास प्रणाली सुचारु रूप से च...

मृदा किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार का होता है- Mrida Kise Kahte Hai?

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मृदा ( मिट्टी ) एक ऐसा पदार्थ है जो पृथ्वी की सतह बनाता है। मिट्टी का निर्माण लाखों वर्षों की प्रक्रिया है। मिट्टी के निर्माण में अनेक बाहरी शक्तियाँ अपना प्रभाव चट्टानों पर डालकर उन्हें कमजोर कर देती हैं, जिससे उनके बारीक-बारीक कण अलग होते जाते हैं तथा मिट्टी का निर्माण होता रहता है। मिट्टी के निर्माण में भूकम्प, ज्वालामुखी जैसी भौतिक शक्तियाँ बड़े-बड़े पहाड़ों को तोड़कर चट्टानों को सरका देती हैं । रासायनिक शक्तियाँ चट्टानों में पाये जाने वाले यौगिकों जल, वायु आदि से विभिन्न रासायनिक क्रियाएँ मिट्टी बनाने में सहायक हैं। इसके अतिरिक्त जैविक शक्तियाँ भी सूक्ष्म जीवों आदि के द्वारा मिट्टी के निर्माण में सहायता करती हैं। प्राचीन काल में पृथ्वी की सतह बहुत कड़ी तथा चट्टानों से बनी थी। ये चट्टानें तीव्र भूकम्पों के कारण छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट गयीं जिससे पृथ्वी के गर्भ से लावा निकलकर दूर-दूर तक पृथ्वी की सतह पर फैलकर जम गया । चट्टानों की दरारों में उपस्थित जल ठण्डा होने से चट्टानों की दरारों पर अत्यधिक दबाव पड़ने से चट्टानें छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल गयीं। पानी के तेज बहाव के कारण चट्टानो...

पृथ्वी और आकाश का संक्षिप्त विवरण-Prithvi aur Aakash Ka Sankshipt Bitrad in Hindi

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पृथ्वी अपनी उत्पत्ति के समय सम्भवत: अत्यधिक गर्म, लचीली एवं आग जैसे रही होगी।धीरे-धीरे करोड़ों वर्षों में इसके ठण्डा एवं (अथवा) संगठित होने मवाथ-साथ इसको ऊपरो परत ठोस बनती गई। इसी ठोस परत को पृथ्वी का धरातल हैं। प्रारम्भ में लगभग 300 करोड़ पूर्व तक अर्थात् पृथ्वी के आधे से अधिक लम्बे जीवनकाल तक औधिक उष्णता या अन्य कारणों से धरातल पर जल एवं सागरों का अभाव रहा। Prithvi aur Aakash Ka Sankshipt Bitrad in Hindi   पृथ्वीं अति उष्ण, शुष्क, किसी भी प्रकार के जल, वनस्पति या प्राणी रहित अजैव स्थिति में रही। आज से ।50 से 200 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी के धरातल के ठण्डा होने से वायुमण्डल अनुकूल बनने, वाष्पीकरण, घनीभवन एवं वर्षा की क्रिया पूरी होने के साथ-साथ महासागरो का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में क्या महासागर इतने ही ठण्डे, खारे या ऐसी ही स्थिति में थे ? यह एक विवाद का विषय है। इस पर विद्वान एकमत भी नहीं 6 U) हैं। धीरे-धीरे सागर स्थायी होते गये, उनका खारीपन आज से 50 करोड़ वर्ष पूर्व तक आधुनिक स्थिति में पहुँच गया। यही काल अजैव पृथ्वी से जैव पृथ्वी के विकास की गुरुआत का काल माना जाता है। आज से 50-6...

महासागर (समुद्र ) का गातयों का परिचय- Mahasahar ka Gatiyon ka Parichay

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महासागरीय जल कभी कभी भी स्थिर नहीं रहता। हवा चलने से जल में गति होने से ज्वारीय लहरें उठती हैं। महासागरों के भौतिक एवं रासायनिक लक्षणों; जैसे- तापमान, खारापन, घनत्चव, बरफ को मात्रा आदि में अन्तर आने पर एवं हवाओं या पवनों के प्रभाव से गर्म प्रदेशों से हल्का व गर्मं पानी नदियों की भाति सागर तल पर शीतोष्ण प्रदेशं की ओर बहता है।  इसी भॉँति धुरवों से भी ठण्डे पानी की धाराएँ चलती हैं। इस प्रकार महासागरोय जल में तीन प्रकार की गतियाँ पायी जाती हैं। यह हैं । (1) लहरें (Waves)  (2) धाराएँ (Currents) (3) ज्वार- भाटा (Tides)  1.लहरें (Waves) जल की सतह पर पवनों के चलने से उसमें दोलन होने लगता है। उससे जल ऊपर एवं नीचे गिरता प्रतीत होता है। इससे पानी लहरदार आकृति व वलन की भाँति दिखाई देता है। अत: ऐसी लहर के ऊपरी भाग को शीर्ष या ऊपरी शिरा एवं निचले भाग को गर्त या द्रोणी कह सकते हैं जब यह गति एक व्यवस्था से बार-बार होती है तो ऐसा लगता है कि मानो पानी आगे बढ़ रहा हो जबकि लहरों में वास्तव में पानी ऊपर-नीचे अवश्य हिलता डुलता या दोलन करता है। उसमें आगे बढ़ने की क्रिया नहीं होती। जैसा कि चित्र...

सल्तनत कालीन भारत-दिल्ली सल्तनत की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण

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कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ई.)- सल्तनल काल में तुर्किस्तान में यह प्रथा थी कि वहाँ के होनहार युवकों को खरीदकर उन्हें युद्ध एवं प्रशासन के कार्य में प्रशिक्षण देकर सुल्तानों को बेचा जाता था, इसलिए वे गुलाम कहलाये । वह गुलाम सुल्तान को सेवा में आने पर ऊँचे वेतन पर जिम्मेदारी के पद सँभालते थे। ऐसे कई गुलाम मुहम्मद गौरी की सेवा में भी थे और भारत के राज्यों में उसका शासन चलाते थे। दिल्ली सल्तनत में प्रथम वंश गुलाम वंश था। सन् 1206 ई. में मुहम्मद गौरी की मृत्यु के पश्चात् उसका तुर्क गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक, जो गौरी का दामाद था, दिल्ली का शासक बना । उसने 1206 ई.. से 1210 ई. तक शासन किया। कुतुबुद्दीन ऐबक को उसकी उदारता के कारण लाखबख्श कहा जाता था अर्थात् वह लाखों का दान करने वाला दानप्रिय व्यक्ति था।  उसने झाँसी, अजमेर, मेरठ, अलीगढ़ और रणथम्भौर पर विजय प्राप्त की। कुतुबुद्दीन को भवन निर्माण में रुचि थी। उसने दिल्ली में कुतुबुमीनार, कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अजमेर में अढ़ाई दिन का झोंपड़ा, उसके द्वारा बनवायी गयी प्रमुख इमारतें हैं । सन् 1210 ई. में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिरकर उसकी म...

अरब इस्लाम का उदय तथा भारत में तुर्की का आक्रमण

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इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब का जन्म अरव देश में क युग में हुआ वह अत्यन्त पतनोन्मुखी था। अरब के निवासी अज्ञानता के अन्धकार ग्रस्त थे। ऐसी भीषण प्रतिकूल परिस्थितियों में सातवीं शताब्दी में अरब देश में रहीं। धर्म का उदय हुआ। इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मोहम्मद साहब थे। इनका जन्म 570 कासिम ने अप मक्का नामक शहर में हुआ था। 40 वर्ष की अवस्था में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। सबसे और इस्ल पिता की मृत्यु उनके जन्म से पूर्व हो गयी थी तथा माता की मृत्यु उस समय हुई उनकी आयु 6 वर्ष थी। उनका पालन-पोषण उनके चाचा अबू तालिब ने किया। बाल्यकाल निर्धनता में व्यतीत हुआ । उन्होंने अपने चाचा के यहाँ भेड़ों के समूहों के देखभाल की तथा व्यापार में अपने चाचा का हाथ बँटाया। पैगम्बर मोहम्मद साहब ने 25 वर्ष की आयु में एक धनी विधवा खदीजा के स निकाह किया । वह उम्र में उनसे 15 वर्ष अधिक आयु की थी। विवाह के उपरान्त में मोहम्मद साहब धार्मिक खोजों में लीन रहे । 40 वर्ष की आयु में फरिश्ता जिबराइल उन्हें ईश्वर का सन्देश दिया कि संसार में उन्हें अल्लाह का प्रचार करने के लिए भेजा है। भक्ति भाव इस घटना के उपरान्त ...

मूल्य की परिभाषा , मूल्य शिक्षा का संक्षिप्त वर्णन-Mulya Ki Paribhasha, Mulya Shiksha Ka Sankshipt Waradan in Hindi

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मूल्य के लिए अंग्रेजी शब्द ' वेल्यू' (Value) का प्रयोग किया जाता है। वास्तव में यदि हम इस शृ 'वैलियर' (Valere) से बना है। 'वैलियर' शब्द का लैटिन भाषा में अर्थ है- योग्यता, उपयोगिता, उत्तमता, कीमत, महत्व आदि । जिसके द्वारा कोई वस्तु लाभदायक या सम्मान योग्य बनती है। इस प्रकार मूल्य शब्द का शब्दकोषीय अर्थ है— Mulya Ki Paribhasha, Mulya Shiksha Ka Sankshipt Waradan in Hindi व्यक्ति या किसी वस्तु का ऐसा गुण जिसके कारण वह महत्वपूर्ण, सम्मानीय तथा उपयोगी सिद्ध हो जाए। यह गुण आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार का होता है । इसके अतिरिक्त मूल्य शब्द का दार्शनिक एवं शैक्षिक अर्थ भी है। दर्शनशास्त्र में मूल्य एक शुद्ध सूक्ष्म तत्व है । मूल्य की परिभाषा 1. “एक ऐसी विशेषता है जिसे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, नैतिक या सौन्दर्यात्मक विचारों के परिपेक्ष्य में उत्कृष्ट समझा जाता है...... तथा ये उस व्यक्ति या व्यक्ति में अन्तर्निहित रहते हैं जो उसके विश्वास के अनुसार सुरक्षा एवं नैतिक सहायता प्रदान करते हैं । "- गुड (डिक्शनरी ऑफ एजुकेशन)  2. “ मूल्य नियामक मापदण्ड हैं जिनके आधार पर व्...

जनसंख्या शिक्षा का अर्थ,परिभाषा, महत्व और जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता

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जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा जनसंख्या शिक्षा दो शब्दों से मिलकर बनी है-जनसंख्या और शिक्षा । अर्थात् जिस शिक्षा में जनसंख्या का ज्ञान निहित होता है उसे जनसंख्या शिक्षा कहते हैं। जनसंख्या शिक्षा को समझने के लिए इसकी परिभाषाओं को समझना आवश्यक है, जो निम्नलिखित हैं- 1. यूनेस्को रीजनल सेमीनार, 1970 में कहा गया है, "जनसंख्या शिक्षा एक शैक्षिक कार्यक्रम है जो कि जनसंख्या परिस्थितियों का एक परिवार, समुदाय, राष्ट्र या दुनियाँ के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन का प्रावधान इस दृष्टि से करता है जिससे छात्रों में इन परिस्थितियों के प्रति एक उदार अभिवृत्ति उत्पन्न हो तथा वह इन्हीं जिम्मेदारी की भावना के कारण इन परिस्थितियों में व्यवहार करे । 2. राज्य शिक्षा संस्थान उत्तर प्रदेश के अनुसार , "यह एक ऐसा प्रयास है जिसके द्वारा विभिन्न वर्गों विशेषकर छात्र-छात्राओं को विश्व के परिप्रेक्ष्य में देश-प्रदेश तथा क्षेत्र की जनसंख्या स्थिति, जनांकिकी के प्रमुख तत्त्वों, जनसंख्या और पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों, जनसंख्या वृद्धि के आर्थिक व सामाजिक विकासों इत्यादि की जानकारी दी जा सकती है। 3. वीडरमैन (Viede...

शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन के कारक

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सामाजिक परिवर्तन का अर्थ सामाजिक परिवर्तन से अभिप्राय जीवन के किसी भी पक्ष में किसी भी प्रकार को परिवर्तन होता है। सामाजिक परिवर्तन में दो शब्द है  (i) सामाजिक  (ii) परिवर्तन  सामाजिक शब्द से आशय है-समाज से सम्बन्धित । मैकाइवर (MacIver) ने समाज को सामाजिक सम्बन्धों का जाल बताया है। परिवर्तन से आशय भिन्नता का होना है । प्रत्येक वस्तु का एक 'पूर्व रूप' होता है, कुछ समय पश्चात् उसमें भिन्नता आ जाती है । हम यहाँ पर पहले परिवर्तन का अर्थ स्पष्ट करेंगे। फिचर (Fitcher) ने परिवर्तन का अर्थ इस प्रकार बताया है- "परिवर्तन को संक्षेप में पहले की अवस्था अथवा अस्तित्व के प्रकार के अन्तर के रूप में परिभाषित किया जाता है।" सामाजिक परिवर्तन समाज से सम्बन्धित होता है। कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार सामाजिक ढाँचे में होने वाला परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहलाता है। परन्तु इसके विपरीत कुछ अन्य समाजशास्त्री सामाजिक सम्बन्धों में अन्तर को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं । समाज सामाजिक संगठन, सामाजिक ढाँचे तथा सामाजिक सम्बन्धों का मिश्रित रूप होता है । अत: समाज में परिवर्तन इन सभी भागों में होने वाल...